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समर्थ : आध्यात्मिक–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            शून्य-कुंभ में नाद भरा, किसने मौन पिलाया है?
                                                                 
                            
राख-गर्भ की निस्तब्धता में, किसने सूर्य उगाया है?
बंद शंख के अंतर-सागर ने, किस तट को गुनगुनाया है?
शिल-निद्रा के गर्भ से किसने, निर्झर-राग जगाया है?

बूँद स्वयं को भूल गई तो, सागर ने अपनाया है,
छाया ने निज देह गँवाई, प्रकाश स्वयं मुस्काया है।
दर्पण टूटा—रूप न टूटा, किसने भेद मिटाया है?
श्वास थमी—जो शेष रहा, वही सत्य कहलाया है।
‘मैं’ की राख जहाँ उड़ गई, ‘वह’ का दीप जलाया है—
जो स्वयं में शून्य हुआ, वही समर्थ कहलाया है।
-सनातन मुकुंद
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एक घंटा पहले

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