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सावन और शिव : भक्तिमय मुक्तक-माला

                
                                                         
                            घिर-घिर घन गाते, गूँजे हरित धरा का मधुर गान।
                                                                 
                            
रिमझिम रस बरसाए, पुलकित हो उठे वन-उपवन-प्राण।
मंद पवन मल्हार सुनाए, झूम उठे पल्लव, विहग गाएँ।
हर बूँद जपे "हर-हर शंभो", शिवमय हो सावन का विहान॥

गंगाजल-सा बरसे अम्बर, धुल जाए जग का अवसाद।
बेल-पत्र की गंध बहे, भर दे मन में निर्मल प्रसाद।
डमरू की अनहद ध्वनि से जागे अंतर का चिर-संवाद।
नीलकण्ठ की कृपा बरसे, मिट जाए जीवन का विषाद॥

कदंब तले कोयल गाए, झर-झर झरते सुधा-समान।
यमुना-तट मुस्काए, हरित लताओं में जागे नव-प्राण।
दामिनि लिखे गगन-पट पर रुद्र-मंत्र का दिव्य विधान।
शिव-पद में जो मन रम जाए, उसका जीवन हो कल्याण॥

मेघ बने कैलास-दूत, नभ पर रचें करुणा का वितान।
भ्रमर गुंजारें, नाचें मोर, कूक उठे पंचम मधुर तान।
सावन का प्रत्येक कण बोले— "ॐ नमः शिवाय"।
वर्षा धो दे तन-मन का प्रत्येक मलिन अभिमान॥
- सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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