सांझ की खिड़की खुली तो, मौन हुआ आकाश।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
अस्त रवि की मौन प्रभा में जागा चिर-सत्य,
नाम-रूप सब लीन हुए, शेष चिदानन्द-तत्त्व।
तम की गोदी में ही पलता ज्योतिर्मय विश्वास।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
सिमट गए सब दृश्य जगत के, मौन हुआ संसार।
हृदयाकाश में जाग उठा चेतन का विस्तार।
श्वास-श्वास में गलने लगा पृथकत्व का पाश।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
खिड़की कोई लकड़ी-पत्थर की देहरी भर नहीं,
मौन स्वयं जब द्वार हुआ, दूरी शेष नहीं।
द्रष्टा, दृश्य, दृष्टि लय हुए, खुला चिदाकाश।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
मौन की अंतिम देहरी पर गल गईं सब सीमाएँ,
'मैं' की अंतिम रेखा ढही, खुलीं अनन्त दिशाएँ।
प्रतिबिम्बों का खेल थमा, मिट गया आभास।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
सांझ नहीं थी— मौन स्वयं अंतस में उतर आया।
जो खोजा था दूर-दूर, निज भीतर ही पाया।
खिड़की, आकाश लय हुए, रहा न कोई भास।
निःशब्द ऋचा से झरने लगा आत्म-प्रकाश॥
- सनातन मुकुंद
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