रज बन उड़ी चरणों से, बन पराग कुसुमों में,
एक कण में भक्ति बसी, एक कण नव-सुमनों में॥
रज कहीं विरक्ति बनी, कहीं सृजन का विस्तार,
रज-कण में छिपा हुआ है जीवन का मर्म-सार॥
रज बन अहं झराती है, रज बन मधु बरसाती,
धूलि बने तो पथ पावन, पराग बने मुस्काती॥
रज का यही रहस्य है—मिटकर महिमा पाना,
सूक्ष्म रज-कण में मिला ब्रह्म-प्रभा का ठिकाना॥
- सनातन मुकुंद
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