अंतर-कुंज में राधे, तेरा ही मधु-गान रहे,
श्वास-श्वास में श्याम, तेरा पावन नाम रहे।
नेत्र मूँदकर देखूँ, अंतस में वृंदावन हो,
मौन अधर पर राधे, प्रेम-सुधा का सावन हो।
बाहर खोजूँ जग को, भीतर तेरा धाम मिले,
बूँद स्वयं सागर हो, ऐसा तेरा नाम मिले।
तन की सीमा गल जाए, मन-दर्पण निर्मल हो,
‘मैं’ का दीप बुझ जाए, अंतर-बोध प्रबल हो।
राधा प्रेम-प्रभा बन, चित्ताकाश में छा जाए,
श्याम-रंग में राधा, श्याममय हृदय हो जाए।
द्वैत सभी विलीन हों, अनाहत नाद बजे,
राधा-नाम जपते ही, अंतर-ज्योति जगे।
न राधा मुझसे बाहर, न श्याम मुझसे दूर,
‘मैं’ का बंधन मिट जाए, प्रेम रहे भरपूर।
-सनातन मुकुंद
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