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प्रेम : मौन की भाषा : प्रतीकात्मक दार्शनिक गीत

                
                                                         
                            शब्द जहाँ थम से गए, प्रेम वहाँ मुस्काए,
                                                                 
                            
निःशब्दों की वीणा पर, अंतर-राग सुनाए॥

नयनों की नीरव ऋचा में, भाव-सुमन झरते,
बिन बोले ही प्राण वहाँ, प्राणों से कुछ कहते॥

स्पर्श नहीं, आभास मात्र, जीवन को छू जाता,
मौन-दीप की एक शिखा, तम का हृदय जलाता॥

अनकहा हर एक क्षण, बन जाता मंत्र-विचार,
चेतन में चिर-सत्य का, खुलता अंतर-द्वार॥

अधरों पर चुप्पी सही, अंतस गाता रहता,
प्रेम अनाहत नाद-सा, स्वयं स्वयं को कहता॥

जहाँ अहं के मेघ मिटे, निर्मल हुआ गगन,
वहीं मौन की गोद में, खिलता प्रेम-सुमन॥

वाणी की सीमा रुकी, अनुभूति हुई साकार,
बूँद-बूँद में झलक उठा, सागर का विस्तार॥

प्रेम न अक्षर, न उच्चार—चिद्-ज्योति का प्रकाश,
मौन स्वयं जब बोल उठे, पूर्ण हुआ विश्वास॥

— श्री सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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