प्रतीक्षा के उस पार कहीं, मौन स्वयं संगीत हुआ,
शून्य-गर्भ के अंतर में, चिरचेतन आलोक हुआ।
काल-तरंगें थम-सी गईं, क्षण शाश्वत आकार हुआ,
जिसे खोजता रहा जग में, वह अंतस का सार हुआ।
बुझते-बुझते दीपक ने जब, तम का संहार किया,
बंद नयन के नीरव नभ में, अनहद ने विस्तार किया।
पथ था बाहर दूर तलक, पर द्वार हृदय में खुलता गया,
जिसको पाने चला जगत में, वह मुझमें ही मिलता गया।
छाया के सब रूप ढले, जब निज प्रतिबिंब निखर आया,
प्रश्न विलीन हुए ऐसे, जैसे अरुणिम-भोर ने तम हराया।
नाद थमा, शब्दों का वन भी, मौन-सुधा में डूब गया,
‘मैं’ की अंतिम रेखा मिटते, अपना ही स्वर छूट गया।
प्रतीक्षा के उस पार खड़ा, कोई नहीं—बस सत्य रहा,
खोज समाप्त हुई जिस क्षण, साधक में ही साध्य रहा।
-सनातन मुकुंद
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