दिन ढलता, तम पलता, संध्या शिव-द्वार सजाती है,
मन की सूनी देहरी पर, मौन-ज्योति जल जाती है।
व्रत केवल अन्न-विरति नहीं, अंतस का उपशमन है,
इंद्रिय-वन के विक्षोभों पर, संयम ही अनुशासन है।
काम-विकारों की ज्वाला को, भस्म-विभूति कर देना,
अहंकार के नागफनों को, शिव-पद पर धर देना।
जीवन-मंथन का विष पीकर, नीलकंठ बन जाना है,
दाह स्वयं सहकर भी जग में, अमृत-भाव बचाना है।
बाहर दीप जले तो क्या, अंतस-तम न मिट पाए,
शिव-अर्चन फलित न होगा, जब तक अहं न ढल पाए।
बिल्व-पत्र क्या, पुष्प क्या—मन जब निर्मल हो जाए,
जल चढ़ता शिवलिंग पर, अंतर्मल भी धुल जाए।
प्रदोष वही, जब चेतन में, रुद्र-नाद जग जाता है,
क्षण-क्षण बहता काल, शिव-स्मरण बन जाता है।
व्रत से बढ़कर भाव बने जब, निज-समर्पण हो जाए,
‘मैं’ का सारा भार गिरे, ‘शिव’ ही शेष रह जाए।
तब न द्वैत, न भेद रहे, न माया का आवेश,
भीतर शिव जब प्रकटें, ‘मैं’ मिटे, शिव शेष।
-सनातन मुकुंद
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