तप्त धरा व्याकुल बैठी, नयनों में थी प्यास।
पावस ऋषि आ पहुँचे, लेकर जीवन-श्वास।।
धरती बोली—"हे गुरुवर! सूना मेरा द्वार।
सूखे तरु, लता, सुमन, उजड़ा सब संसार।।"
ऋषि बोले—"धीरज धर, होगा कष्ट-विनाश।
तप के पीछे छिपा है, नवजीवन का प्रकाश।।"
मेघ खड़े शीश झुकाए, पाकर गुरु का मान।
घन-घटा तब बरस पड़ी, बनकर अमृत-दान।।
पवन बना संदेशवाहक, लेकर मधुर पुकार।
जागो-जागो, धरती! आया सुख का द्वार।।
रिमझिम-रिमझिम मेघ बरसे, भीगी धरा अपार।
हरित वसन फिर ओढ़ धरा, खिल उठा संसार।।
लता-विटप सब झूम उठे, गाने लगे मल्हार।
नदियाँ हँसकर बहने लगीं, पाकर नव विस्तार।।
किसान बोला—"ऋषिवर! तुमसे जागी मेरी आस।
लहलह होंगे अब खेत हमारे, मिट जाएगी प्यास।।"
ऋषि बोले—"प्रकृति-पूजन है जीवन का धर्म।
वृक्ष बचाओ, जल-संचय, यही श्रेष्ठ है कर्म।।"
हरित आँचल फैलाए धरा, किया कृतज्ञ वंदन।
मेघ बने वरदान सभी के, धन्य हुआ जीवन।।
पावस ऋषि छोड़ गए, अमृतमय उपकार।
उनकी करुणा से महका, यह सकल संसार।।
युग-युग गाए धरा यही, पावस ऋषि गुणगान।
जीवन-सुधा बरसाते रहो, हे ऋषिवर! प्रणाम।।
-सनातन मुकुंद
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