पथ कठिन हो, पाँव थके हों, फिर भी चलते जाना है,
धूप मिले तो धूप पीकर, छाँव स्वयं बन जाना है।
ठोकर को सोपान समझकर, गिरकर फिर उठ जाना है,
राह भले अनजान मिले, फिर भी आगे बढ़ जाना है।
रात कहे, “अब रुक जा पथिक!”, दीप कहे, “मत हार रे!”,
आँधी चाहे जितना झकझोरे, बढ़ता चल उस पार रे।
मंज़िल बाहर खोज न पथिक, अंतस में दीप जलाए,
चलते-चलते पथ ही जिसका, जीवन-गीत बन जाए।
कंटक-पथ पर पग धरता, पथिक स्वयं निखरता जाए,
धूप-दाह को दीप बनाकर, अंतर-तम हरता जाए।
ठोकर की हर चोट तराशे, चेतन-शिला सँवरती जाए,
गिरकर अपनी धूल झटकता, पर्वत-सा फिर उठता जाए।
मरीचिका के रंग उतरते, जब अंतर्दृष्टि जगती है,
मौन दिशा की वीणा बनकर, चेतना भीतर बजती है।
जिस मंज़िल को दूर समझता, वह निज अंतर में मुस्काए,
पथिक जहाँ स्वयं को पा ले, पथ भी वहीं विलीन हो जाए।
- सनातन मुकुंद
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