सूने आँगन की निस्तब्धता, बीज नया धरती है,
टूटी वीणा की हर खामोशी, मधुर तान बन बजती है।
मुट्ठी से झरती रेत नहीं, काल-धारा बहती है,
जो क्षय में भी अर्थ खोजे, चेतन-ज्योति न मरती है।
काँटे चाहे पथ रोकें, चरण कहाँ रुक पाते हैं,
बढ़ते पग के साथ क्षितिज, नए रूप धर जाता है।
धूप भले ही देह जलाए, छाया भीतर पलती है,
घावों की गहरी स्याही से, चेतना नई ढलती है।
मेघ स्वयं का भार लुटाकर, धरती की प्यास बुझाते हैं,
नाम विसर्जित कर नदियाँ, सागर में मिल जाते हैं।
जो अपने होने की सीमा से, आगे स्वयं उतर जाता,
माटी होकर भी युग के माथे, अक्षर बनकर उभर आता।
जब अंतर्मन में तम छाए, नयनों में आकाश जगे,
जब संशय के शूल उगें तो, मौन स्वयं विश्वास जगे।
मंज़िल बाहर कहाँ मिलेगी, पथ ही भीतर खुलता है,
जिसे खोजता रहा जग में—वह अंतस में ही मिलता है।
- सनातन मुकुंद
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