पथ ने मौन तपोदीप धर, रज का तिलक सजाया,
काल-करों के कठोर स्पर्श ने, धैर्य-कमल खिलाया॥
शूलों ने आलिंगन माँगा, पग ने हास बिखराया,
पीड़ा की पराग-धूल से, नव अर्घ्य रच पाया॥
झंझा ने शंख बजाया, मौन और गहराया,
निस्तब्ध शिखा के अधरों पर, अनहद-नाद समाया॥
शैलों की निस्पंद समाधि ने, अंतर-आकाश बसाया,
सरिता की अविरल गति ने, क्षण को सिंधु बनाया॥
मरु की दग्ध निःश्वासों में, मौन ने घर पाया,
प्यास स्वयं संजीवनी बन, अंतर-स्रोत बहाया॥
रज-कण में युग-स्वप्न पले, बूँदों में नभ समाया,
सीमित कण-कण में चुपके, ब्रह्मत्व मुस्काया॥
क्षितिज स्वयं पग-पग सरका, पंथ न कभी भरमाया,
हर अवरोध शिलालेख-सा, चरणों तले झुक आया॥
चलते-चलते नाम झर गए, 'मैं' का आवरण गल पाया,
श्वासों की नीरव वीणा पर, अनाम राग उतर आया॥
भोर न बाहर से उतरी, अंतस स्वयं उजियाया,
आत्मदीप की एक शिखा में, विश्व स्वयं समाया॥
अंतिम पद भी मौन हुआ, किसने किसको पाया?
पथ ही प्रार्थना बन बैठा... मौन शेष रह पाया॥
-सनातन मुकुंद
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