धूप ढली तो संग चली, तम में भी साथ निभाती रही,
जिसे स्वयं का रूप कहा, वह मुझसे दूर जाती रही।
दर्पण के उस मौन तल पर, कौन खड़ा था रूप धरे?
मैं ही था या कोई मुझमें, जन्म-जन्म से मौन धरे?
देह-दीप की लौ के पीछे, छाया नित आकार बनी,
मैंने जिसको सत्य समझा, वह माया साकार बनी।
काल-कराल की रेतों पर, पदचिह्न सभी बह जाते हैं,
चेतन-गुहा के शून्य-कक्ष में, संस्कार कहाँ मिट पाते हैं?
मृगतृष्णा के मरीचि-जाल में, जग के रंग बदलते हैं,
जिनको अपना मान पकड़ता, वे ही हाथों से ढलते हैं।
अंतर-आकाश में जब जागी, आत्मज्योति की एक किरण,
छाया सिकुड़ी, ‘मैं’ गलने लगा, खुलने लगा निज अंतःकरण।
अहं-अंधेरी संध्या टूटी, मौन प्रभात उतर आया,
जिसको बाहर खोज रहा था, वह अंतर में स्वयं समाया।
छाया मैं, छाया यह जग है, छाया ही संसार हुआ,
छाया के उस पार जो ठहरा, वही चिरंतन सार हुआ।
रूप, अरूप, प्रकाश, तिमिर—सब उसी एक के खेल हुए,
परछाईं के पार गया तो, निज से निज के मेल हुए।
‘मैं’ की अंतिम रेखा मिटते, कौन रहा फिर कहने को?
बूंद स्वयं सागर में उतरी—क्या शेष रहा बहने को?
अब न छाया, न छायाकार, न दर्पण, न प्रतिबिंब रहा,
जिसको ‘मैं’ कह खोज रहा था, वही चिरंतन चैतन्य रहा।
- सनातन मुकुंद
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