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पन्नों का स्पर्श : प्रतीकात्मक दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            मौन पन्नों की तह में जैसे, बीते युग मुस्काते हैं,
                                                                 
                            
अक्षर-अक्षर दीप जलाकर, मन-मंदिर जगमगाते हैं।

स्याही की बूँदों में जैसे, नभ के तारे झिलमिलाते हैं,
शब्दों की मधु-धार बहाकर, सूने मानस को महकाते हैं।

पीले पन्ने धूप सँजोकर, स्मृति-उपवन महकाते हैं,
बीते क्षण की पदचापों को, फिर आँगन तक ले आते हैं।

कहीं विरह की नील घटाएँ, कहीं मिलन की मधुर कथा,
एक पृष्ठ में छिपी हुई है, जीवन की सम्पूर्ण व्यथा।

कहीं प्रश्नों के शूल खिले हैं, कहीं उत्तर के सुमन खिले,
कहीं अँधियारा राह दिखाता, कहीं चेतन-दीपक जले।

उँगली जब पन्नों पर फिरती, समय स्वयं रुक जाता है,
मौन ग्रंथ का एक स्पर्श ही, अंतर्मन पढ़ जाता है।

शब्द नहीं ये—काल-शिला पर, अंकित अमिट निशान हैं,
हर पृष्ठ के अंतर में सोए, कितने जीवन-प्राण हैं।

पन्नों की यह मंद सरसर, जैसे वीणा की झंकार,
एक स्पर्श में खुल जाता है, मन का कोई बंद द्वार।

पढ़ते-पढ़ते स्वयं पाठक ही, एक नया अध्याय बने,
अक्षर-अक्षर आत्मबोध के, निर्मल दीपक-सा जले।

जब अंतिम पृष्ठ झर जाता, कथा कहाँ समाप्त हुई?
शब्द विलीन हुए तो भीतर, एक नई अनुभूति हुई।

पन्नों का यह कोमल स्पर्श ही, जीवन का संवाद बने,
बाह्य ग्रंथ से अंतर-ग्रंथ तक, चेतन-पथ का दीप जले।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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