प्रिय, फिर कभी हम मिल भी गए,
तो वह पहले-सा कहाँ परिदृश्य होगा।
आँखों में सावन ठहरा होगा,
अधरों पर कोई मौन खिला होगा।
जिन पगडंडियों पर साँझ ढली थी,
उन पर अब धुँधली धूप मिलेगी,
कदंब तले जो गंध बसी थी,
वह भी स्मृति बनकर ही खिलेगी।
वही चाँदनी, वही चाँद होगा,
पर रातों में वह राग कहाँ;
वही नदी, वही तट होंगे,
पर लहरों में अनुराग कहाँ।
तेरे केशों में फूल रहेंगे,
पर उनमें वह गंध कहाँ होगी;
मेरी आँखों में नीर रहेगा,
पर उनमें वह उमंग कहाँ होगी।
हम दोनों कुछ कह भी देंगे,
शब्द मगर निष्प्राण मिलेंगे;
होंठों पर मुस्कान सजेगी,
नयनों में अनकहे प्रश्न मिलेंगे।
जिस स्पर्श ने ऋतु बदल दी थी,
वह स्पर्श कहाँ फिर लौटेगा;
बीता मौसम लाख पुकारे,
क्या फिर अपनी देहरी लौटेगा?
प्रिय, फिर कभी हम मिल भी गए,
तो वह पहले-सा कहाँ परिदृश्य होगा;
तुम भी तुम-सी कहाँ रहोगी,
मैं भी मैं-सा कहाँ रहूँगा।
मिलना केवल मिलना होगा,
मन का मिलना कहाँ सहज होगा;
हम होंगे उस मोड़ खड़े—
पीछे छूटा पूरा एक युग होगा।
- सनातन मुकुंद
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