घन-गर्जन घनश्याम-सा, चेतः-वीणा झंकृत।
दामिनि-स्मृति-द्युति-जाल, अन्तर-दाह उद्दीप्त।
पावस-बिन्दु-सिक्त, प्राण-पटल अभिसिञ्चित।
प्रिय-विरह-निःश्वास-भर, नयन-नीर अविरत॥
नील-नभ मेघ-मुकुट, दिक्-दिक् राग-विभासित।
मन्द-पवन मृदु-मन्त्र-सा, मानस-पुष्प सुवासित।
मिलन-सुधा सुदुर्लभा, भाग्य-लिपि अवरुद्धा।
हृदय-यज्ञ विरहाग्नि, स्वप्न-समिध प्रज्वलित॥
बिन्दु-बिन्दु अम्बु-कण, मोति-माल विभावित।
वनोपवन पुलकायित, धरणी-वपु हरितायित।
केवल मम अन्तर्मन, निःसीम-शोक प्रतिष्ठित।
प्रिय-पदचाप-अन्वेषण में, जीवन-पन्थ श्रमित॥
वृष्टि-विलसित विश्व-वपु, चिदम्बर आलोकित।
कोकिल मौन, मयूर-नृत्य, भाव-गगन कम्पित।
विरह-वेदना तप बन, प्रेम-स्वर्ण परिशोधित।
प्राण-दीप प्रतीक्षारत, मिलन-प्रभात उदित॥
-सनातन मुकुंद
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