स्वर्ग-सुरभित विथिका से, उतरा दिव्य प्रसाद,
पारिजात! तू साक्षात, प्रेम-विरह का नाद।
शून्य-आभा में लिपटी, श्वेत पंखुड़ियाँ कोमल,
मानो थकी संध्या ने, ओढ़ा धवलांचल विमल।
नक्षत्र-ओस पीकर, तू धरती पर उतर आता,
क्षितिज-उर में स्पंदित, जैसे विस्मृत नाद गाता।
नहीं यह सामान्य पुष्प, देव-तरु का संन्यास है,
जग की मोह-पाश-मुक्त, निराकार आभास है।
रजनी-अंतस में जगती, तेरी सुरभि-आत्मबोध,
जग-कोलाहल से दूर, परमपद का प्रबोध है।
मकरंद तेरा अद्वैत, जिसमें खो जाती है मति,
काल-चक्र-परे स्थित, शाश्वत ज्योति की रति।
प्रातः तू बिखर जाता, जैसे तन का मोह छूटता,
अस्तित्व-मौन समर्पण, निज से निज में फूटता।
दिव्य अनुग्रह तू, भक्ति और शून्य-प्रसार है,
हे पारिजात! तू आदि-अनंत, मोक्ष-सार है।
-सनातन मुकुंद
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