शून्य से अवतरित, श्वेत-केशर-धारिणी,
स्वर्ग की मौन वीणा, व्योम की अनुकारिणी।
अश्रु-कण से सिंचित, स्वर्णिम-अंचल डालियाँ,
धूलि में बिखरी हुईं, देव-दत्त तालियाँ।
समुद्र-मंथन कथा, हलाहल का दंश है,
मृदुल सी कांति में, रचित सुखद अंश है।
रात भर जो रोई, भोर में मुस्काई है,
नक्षत्रों की आभा, चूनर में बिछाई है।
गंध मलयज सी, स्मृति में घुलती हुई,
काल की लकीर पर, कलियाँ खुलती हुई।
प्रेम की परिभाषा, विरह का निमंत्रण,
मृदा की गोद में, खिले हुए मंत्र-कण।
अनश्वरी काया, फिर भी जीवन अल्प है,
क्षणिक सा सौंदर्य, यही तो श्रेष्ठ कल्प है।
मुकुंद, यह पुष्प नहीं, एक निश्छल गान है,
धरा की ललाट पर, स्वर्ग का संधान है।
- सनातन मुकुंद
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