न्याय माँगती बेटियाँ, जागो हिन्दुस्तान।
कब तक रोएँगी व्यथित, टूटे उनके प्राण॥
कोख से लेकर चिता तलक, पीड़ा का विस्तार,
हर चौखट पर पूछ रही, मानवता लाचार॥
टूटी चूड़ी, बुझते सपन, आँसू का संसार,
निर्दयता के हाथ क्यों, छीनें उनका प्यार॥
माँ की सूनी आँख में, जलते प्रश्न हजार,
बिन अपराध ही सह रही, बेटी अत्याचार॥
धन-दौलत की भीड़ में, बिकता क्यों सम्मान?
कैसा यह कानून है, कैसा यह विधान?
चौराहों पर चीखती, मौन हुई पहचान,
सत्ता! तेरे द्वार पर, कब जागेगा मान?
मत समझो दुर्बल उन्हें, वे जीवन की शान,
उनसे ही तो महक रहा, यह सारा जहान॥
दोषी को दंडित करो, यही देश की आन,
बेटी का विश्वास ही, भारत की पहचान॥
न्याय मिले हर बेटी को, यही रहे अभियान,
मानवता फिर गा उठे, करुणा का गुणगान॥
- सनातन मुकुंद
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