नवदुर्गा के नौ रूपों में, एक शक्ति महान,
कण-कण में माँ, तुझसे ही जीवन का संधान।
हिमगिरि से नभ-मंडल तक, महिमा अपरंपार,
तेरे चरणों में नत होता, श्रद्धामय संसार॥
शैलपुत्री धैर्य जगाएँ, ब्रह्मचारिणी तप-ज्योति,
चंद्रघंटा के नाद से जागे, अनाहत चेतन-शक्ति।
कूष्मांडा से सृष्टि प्रकाशित, जागा सृजन-विहान,
स्कंदमाता के अंक में शोभे, वात्सल्य का गान॥
कात्यायनी धर्म जगाएँ, कालरात्रि भय हरें,
महागौरी निर्मलता बरसाएँ, अंतस उज्ज्वल करें।
सिद्धिदात्री कृपा से खोलें, मुक्ति का द्वार,
नौ रूपों में एक चेतना, महिमा अपरंपार॥
तू तम में दीपशिखा माँ, तू उषा की मुस्कान,
तू निर्झर की कलकल में, वेदों का मधुगान।
तेरी शक्ति के स्पंदन से, प्रकृति करे विस्तार,
तेरी मौन साधना में, ब्रह्म का हो साक्षात्कार॥
अहंकार के दुर्ग गिरा दे, विवेक बने तलवार,
मोह-तिमिर के पार दिखा दे, आत्मतत्त्व का द्वार।
मन-मंदिर में ज्योति जगा दे, मिटे भेद-अज्ञान,
नौ रूपों में माँ, तुझमें ही ब्रह्मशक्ति का भान॥
नौ दीपों की एक प्रभा तू, नौ सरिताओं की धार,
नौ स्वरों में अनाहत गूँजे, एकत्व का विस्तार।
शक्ति-भक्ति-मुक्ति-प्रदायिनी, जग का दिव्य विधान,
नौ रूपों में माँ, शत-शत नमन—तुझमें जग, तुझमें प्राण॥
- सनातन मुकुंद
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