किस मौन-बीज की नाभि तले, चिद्-भास्कर उदित होता?
किस भू-गर्भित तप-ज्वाला से, हरित स्पन्दन प्रकट होता?
मृत्तिका की ध्यान-समाधि में, किसने मन्त्र सुनाया है?
जड़ के गहन निःशब्द हृदय में, किसने प्राण जगाया है?
ओस-बिन्दुओं की अक्षत-माला, पल्लव-पट पर झिलमिल है।
प्रथम प्रभात की स्वर्ण-विभा में, ब्रह्म-स्मृति प्रस्फुरित है॥
झंझा के तीक्ष्ण प्रहारों में, जिसने धैर्य न छोड़ा है।
लघु अंकुर ने धरा-उर पर, जीवन-मन्त्र संजोया है॥
मूल-तमस की गुहा त्यागकर, ज्योति-दिशा की ओर चला।
अन्तःस्थित ऋत का अनुगायक, ऋचा-स्वर बन स्वयं ढला॥
नवांकुर का घोष न केवल, कोमल पल्लव का स्पन्दन।
यह तो आत्मा के अन्तर में, जाग्रत सत्य का अभिनन्दन॥
हरित शिखा बन चिदाकाश में, आशा-अर्चि प्रज्वलित होती।
अंश-बिन्दु में पूर्ण-ब्रह्म की, अनाहत वीणा मुखरित होती॥
जहाँ विनय की जड़ गहरी हो, वहाँ विराट तरु फलता।
लघु जीवन भी लोकमंगल हित, कल्पतरु-सा लहलहाता॥
बीज न बोता केवल वन को, चेतन-युग का द्वार खुला।
एक अंकुर के प्रथम घोष से, सुप्त अन्तरलोक जागा॥
आओ! अपने मौन-गर्भ में, सत्य-ज्योति का बीज जगाएँ।
नवांकुर बन ऋत के पथ पर, जीवन-मंगल गान सुनाएँ॥
-सनातन मुकुंद
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