श्रावण-शुभ्र प्रभात में, मंगल-दीप जलाएँ,
नागदेव के पावन चरणों में शीश नवाएँ।
शिव-कंठ-विभूषण बन, तुम विष का भार उठाते,
नीलकंठ के संग रहकर, त्याग-धर्म समझाते।
शेषनाग की शय्या पर, नारायण विराजें,
वासुकि बने मंथन-रज्जु, देवासुर बल लगाएँ।
कालिय के विष-दर्प को, कृष्ण-चरणों से हरते,
यमुना की विषधारा को, निर्मल पथ पर धरते।
नाग नहीं केवल भय का, जीवन का भी प्रतीक,
धरती की गहन चेतना, सृष्टि-चक्र का संगीत।
कुण्डलिनी की सुप्त शक्ति, अंतर्मन में जागे,
अज्ञान-विष के फण कुचल, ज्ञान-ज्योति जगमगाए।
जीव-जगत् में एक चेतना—यह ऋषि-वाणी गाएँ,
करुणा, मैत्री, समता से, जीवन-पथ सजाएँ।
नाग-पंचमी का पर्व यही, मंगल-मंत्र सुनाए—
प्रकृति-पूजन से मानव, अपने भीतर शिव पाए।
— श्री सनातन मुकुंद
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