मौन पुकारों के उत्तर तुम, धड़कन में बन दीप जले हो।
प्राण-पटल के परम प्रभाकर, अंतर-आकाश स्वयं खिले हो॥
जब-जब मन की वीणा रोई, तुम अनहद संगीत बने हो।
सूने मंदिर की प्रतिध्वनि में, नित्य प्रणव के गीत बने हो॥
तम के गहन अतल सागर में, चेतन-ज्योति बनकर जले हो।
मौन पुकारों के उत्तर तुम, धड़कन में बन दीप जले हो॥
बिंदु-बिंदु में ब्रह्म समाया, यह रहस्य तुमने ही खोला।
अहंकारों का हिम गलाकर, प्रेमामृत का स्रोत खोला॥
श्वास-श्वास में सत्य सुवासित, आत्मदीप बन नित्य जले हो।
मौन पुकारों के उत्तर तुम, धड़कन में बन दीप जले हो॥
नयन न देखें रूप तुम्हारा, फिर भी सर्वत्र तुम्हीं प्रकाशित।
शून्य हुआ जब अंतर्मन यह, चिदानन्द-स्वरूप प्रकटे हो॥
जीव-हृदय से ब्रह्म-क्षितिज तक, दिव्य सेतु बन आज मिले हो।
मौन पुकारों के उत्तर तुम, धड़कन में बन दीप जले हो॥
- सनातन मुकुंद
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