माटी में सोया बीज, मौन-मौन मुस्काता है,
अंधकार की कोख से ही, अंकुर बनकर आता है।
धूप तपाए, मेघ रुलाएँ, ऋतुएँ रंग बदलती जाएँ,
मूल धरा में गहरे हों तो, शाखाएँ नभ छू आएँ।
पत्ते झरें, कोंपल फूटें, फूल खिलें, फल गिर जाएँ,
रूप बदलते रहें निरंतर, जड़ जीवन-रस बरसाएँ।
छाँव लुटाए तन अपना, फिर भी वृक्ष न कुछ बतलाए,
जिसके भीतर प्रेम जगे, वह देने का मोल न पाए।
एक दिन जब वज्र गिरे और तना जड़ों से टूटे,
मूल धरा से जुड़ा रहे तो, प्राण भला कैसे छूटे?
लकड़ी जलकर राख हुई तो, राख गगन में जाती है,
रूप बदलता रहता फिर भी, सत्ता कहाँ मिट पाती है?
नाम मिटे, आकार मिटे, पद-प्रतिष्ठा ढल जाए,
जो अपने मूल में जागा हो, वह फिर कैसे मिट जाए?
वृक्ष यही चुपचाप कहे—मत रूपों पर इतराना,
मूल बचा तो फिर जीवन है; मूल गया तो क्या पाना?
- सनातन मुकुंद
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