मेघ-मल्हार के स्वर में, प्राण-वीणा झंकृत हो,
श्याम-घन के स्पर्श से, चेतन-चाँदनी दीप्त हो।
रिमझिम ऋचाएँ प्रेम की, अम्बर-अंतर गुनगुनाएँ,
मौन-बाँसुरी के राग, अंतर-आँगन मुस्काएँ।
दामिनी-दृष्टि लिख रही, अनहद-स्नेहिल मंत्र नए,
बूँद-बूँद ब्रह्मानुभूति, सिंधु-हृदय में जन्म ले।
प्रिय न तुम, न मैं रहूँ—एक रस का विस्तार हो,
मेघ-मल्हार के प्रेम में, स्वयं परम का साकार हो॥
— श्री सनातन मुकुंद
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