शब्द जहाँ थक हार गए, मौन वहाँ मुस्काया,
अंतस के निर्झर ने तब अपना पथ अपनाया॥
पहली सीढ़ी मौन की, मन से मन तक जाती,
अहंकार के आवरणों को धीरे-धीरे हटाती॥
निःशब्द वीणा के स्वर में, अनहद राग समाया,
शून्य-पटल पर चिद्-ज्योति ने अपना दीप जलाया॥
प्रश्न सभी नतशीश हुए, उत्तर स्वयं प्रकट था,
बूँद समझती रही स्वयं को, सागर भीतर घट था॥
दृष्टि हुई जब अंतर्मुख, नभ भी भीतर उतरा,
काल स्वयं ठहर-सा गया, चिदाकाश तब निखरा॥
मिटे विकल्पों के वन, जागा सहज विवेक,
चेतन की दहलीज़ पर खिले पुष्प अनेक॥
दीप न कोई बाहर था, ज्योति स्वयं उर आई,
मौन-शिला पर समय ने अमर ऋचा लिखवाई॥
सीढ़ी केवल एक नहीं, साधना का विस्तार,
हर पग पर छूटे जगत, हर श्वास बने उपहार॥
जो इस प्रथम सोपान पर निस्पृह होकर ठहरा,
उसके अंतर-आकाश में चिद्-सूर्य तब उभरा॥
मौन नहीं निस्तब्धता, चेतन का अभिनन्दन,
पहली सीढ़ी बन गई परमतत्त्व का वन्दन॥
- सनातन मुकुंद
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