मस्तक ऊँचा सदा रहे, निज मान की ज्योति को गहे।
लकीर जो भाग्य की कहे, वही भविष्य का पंथ लहे॥
अहं न सिर पर हो सवार, बुद्धि न हो तम की शिकार।
झुकना न हो हीनतामय, स्वाभिमान ही हो जय-जय॥
पछतावे का न हो निशान, बीते कल को दे अवसान।
लाड़ न इतना सिर चढ़े, बन जाए जीवन का शूल॥
मस्तक का यह मोल महान, जो रखे देश का मान-सम्मान।
मुकुंद! पढ़ना यह विधान, कर्म ही भाग्य का है दान॥
-सनातन मुकुंद,
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