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मन-मंदिर कान्हा : प्रतीकात्मक–भक्तिपरक गीतिका

                
                                                         
                            मन-मंदिर के मौन गर्भ में,
                                                                 
                            
श्याम तुम्हारा धाम रहे,
अंतर की प्रत्येक श्वास में,
अधरों पर तेरा नाम रहे।

चित्त-वृंदावन-कुंजों में,
प्रेम-सुधा अविराम बहे,
भाव-यमुना की लहरें,
चरण-कमल तक नित्य बहें।

मोह-मरीचि के घोर तिमिर में,
ज्ञान-प्रदीप प्रकाशित हो,
अहंकार के शुष्क वन में,
करुणा-मेघ सदा बरसें।

काम-क्रोध के विषधर दल पर,
मुरली-मंत्र प्रभाव करे,
चंचल चित्त की तमस-तरंगें,
श्याम-स्मरण से शांत करें।

नयन-नयन में नील नभ हो,
रोम-रोम रसधाम रहे,
कण-कण में तेरी छवि झलके,
जीवन तेरा नाम रहे।

सांसारिक बंधन टूटें सारे,
ममता निर्मल नीर बने,
तेरे चरणों में मन अर्पित हो,
जीवन पावन प्रणति बने।

जब मैं-भाव विलीन हो जाए,
केवल तेरा भान रहे,
मन-मंदिर में कान्हा विराजें,
मैं न रहूँ, बस श्याम रहे।
- सनातन मुकुंद
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2 घंटे पहले

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