कोई तुमसे पूछे—“कौन हूँ मैं?”, मुस्काकर इतना कहना,
माटी-तन में चेतन-ज्योति, दीपशिखा बनकर रहना।
बूँद नहीं, मैं सिंधु सनातन, लहर-लहर में बहता हूँ,
क्षण-क्षण रूप बदलता जग, फिर भी अचल मैं रहता हूँ।
ऋतु-ऋतु ढलती देह पुरानी, बदलते कितने नाम,
दर्पण टूटे, दृश्य मिटे तो, शेष रहे निज धाम।
श्वासों की सरगम में छिपकर, कौन अनाहत गाता है?
मौन-गगन के पार वही तो, मुझको मुझसे मिलाता है।
मैं ही प्रश्न, मैं ही उत्तर, मैं ही पथ, मंज़िल मैं,
अपने भीतर उतर सको तो—कह देना, “ब्रह्म हूँ मैं!”
- सनातन मुकुंद
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