मौन निस्तब्धता खंडित हुई, पुलक-तरंगें उमड़ पड़ीं,
सुप्त सुरों की तंद्रा टूटी, स्मृतियाँ सुधा-सी झर पड़ीं।
किसने मन की वीणा छेड़ी, झंकृत हुआ व्योम अपार,
मृदुल स्पंदों की लय पर, चेतन-कलियाँ निखर पड़ीं॥
धूलि-धूसरित भावों में फिर, नव पल्लव का प्रस्फुटन हुआ,
शून्य हृदय के गलियारों में, प्रीति-सुधा का अवतरण हुआ।
किसने मन की वीणा छेड़ी, गुंजित हुआ सकल जीवन,
मौन-तपी इस अंतर-तल में, अमृत-रस का प्रसरण हुआ॥
कर्ण-कुहर में गूँज उठी, नूपुर की वह दिव्य ध्वनि,
भाव-विह्वल मन मौन हुआ, बन तपस्वी-सा मूक मुनि।
किसने मन की वीणा छेड़ी, जाग उठा अंतर-चैतन्य,
श्वास-श्वास के स्पंदन में, गूँजी अनहद मधुर धुनि॥
दिव्य राग की लहरी बन, चेतन-गगन में विहरण है,
शब्द हुए जब मंत्र स्वयं, आत्मा का जागरण है।
किसने मन की वीणा छेड़ी, प्रकट हुआ परम-चैतन्य,
मौन अधर की ओट तले, ब्रह्म-स्वरूप का वरण है॥
- सनातन मुकुंद
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