करुणा चिद्ज्योति प्रखर, जीवन का आलोक।
जिससे गलता अहं सदा, मिटता भव का शोक॥
अश्रु नहीं—अमृत-सरित, आत्मा का संगीत।
पीड़ा तप की दीप्ति बन, गाती मंगल-गीत॥
परदुःख अपना जान जो, खोले अंतर-द्वार।
उसमें प्रकटे ब्रह्म का नित्य अनंत विस्तार॥
करुणा जीवितोपनिषद्, करुणा वेद-विधान।
जिसने इसको जी लिया, पाया ब्रह्म-निधान॥
- सनातन मुकुंद
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