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कजरी तीज : श्रृंगार-विरह लोकगीत

                
                                                         
                            तीज कजरी आई रे सखि,
                                                                 
                            
घिरि-घिरि आए बदरा।
झूला झूले कदंब की डारी,
भीजे मनवा अधरा॥

हरियर चुनरी धरती ओढ़े,
महके गली-अँगना।
पायल छनके, मनवा नाचे,
जागे प्रेम-सपना।
सखियाँ मिल गाएँ कजरी,
झूमें डारन-डारी,
सूना लागे नैनन मोरे,
बिन पिया सूनी फुलवारी॥

मेहँदी रची हथेली में,
बिंदिया माथे दमके।
चूड़ी छनके, पायल खनके,
मन पिया-पिया चमके।
बादर गरजे, बिजुरी चमके,
रस बरसे अंबर से,
नैन तरसें पिया-दरस को,
भीजे सावन-जल में॥

पवन पुकारे, “आओ साजन”,
गंध लिए पुरवाई।
अमवा डोले, कजरी बोले,
जागी प्रीत पुरानी।
मिट जाए मन की दूरी,
मिल जाएँ दो प्राणी,
तीज बने मिलन-उत्सव,
सज उठे प्रेम-कहानी॥

सोलह सिंगार किए बैठी,
नैनन बाट निहारें।
दूर बजे जब मधुर मुरलिया,
मनवा पंख पसारें।
घूँघट उठे, हँसी खिल जाए,
पिया द्वार जब आएँ,
भीगी-भीगी तीज की रुत में,
साजन गले लगाएँ॥

तीज कजरी आई रे सखि,
घिरि-घिरि आए बदरा।
झूला झूले कदंब डारी,
भीजे मनवा अधरा॥
-सनातन मुकुंद
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एक महीने पहले

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