बाज़ के पंजों में
एक साँप काँपता है,
साँप के फन में
एक चिड़िया की आँख।
चिड़िया की आँख में
आकाश उलटा है—
नीला,
मगर बंद।
नीचे नदी है;
मछली जल को चीरती है,
फिर उसी जल में
अपनी ही प्यास से घिर जाती है।
वन में जाल है,
जाल में पक्षी—
और पक्षी की चोंच में
जाल बुनती मकड़ी का
एक अधूरा स्वप्न।
कौन किसे बाँधता है?
धागा गाँठ को,
गाँठ उँगली को,
उँगली भय को—
और भय
मनुष्य को।
लिखो—
हर शिकारी के भीतर
एक घायल शिकार
सोया हुआ है।
हर विष की तह में
औषधि का बीज है,
हर प्रकाश की पीठ पर
अँधेरे की परछाईं।
दीया जलता है—
तेल की देह घटाकर।
चाँद खिलता है—
रात का ऋण लेकर।
नदी समुद्र में उतरती है—
मिटने के लिए
या पूर्ण होने के लिए?
लहरें चुप हैं—
उत्तर
दोनों दिशाओं में बहता है।
मनुष्य भी नदी है—
एक पाँव मुक्ति में,
दूसरा अपनी ही
बनाई हुई बेड़ियों में।
उसने कफ़स बनाया,
फिर उसकी सलाखों पर
आकाश उकेर दिया।
अब बाहर का आकाश
उसे मुक्त नहीं करता;
भीतर का आकाश
उसे सोने नहीं देता।
यहीं
दर्द जन्म लेता है—
घाव बनकर नहीं,
बंद द्वार की देह में
धीरे-धीरे उगती
कुंजी बनकर।
दर्द गहराता है,
दीवार पारदर्शी होती है।
संघर्ष उठता है—
भीतर बैठा प्रहरी
पहली बार
अपनी ही छाया से डरता है।
फिर ख़्वाब आता है—
दीप लेकर नहीं,
उसकी लौ में
एक अजन्मा सूर्योदय लेकर।
तभी खुलता है रहस्य—
कफ़स लोहे का नहीं था,
लोहे को सत्य मान लेने का था।
प्रहरी बाहर नहीं था,
मेरी ही आँखों में
बैठा हुआ भय था।
और आकाश?
वह कभी
सलाखों के बाहर था ही नहीं।
वह भीतर
इतना विस्तृत था
कि अंततः—
कफ़स
आकाश में नहीं खुला,
आकाश ही
कफ़स में खुल गया।
- सनातन मुकुंद
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