जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
माई निर्जल नेम निभावे, अँखियन बरसे प्यार,
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर।
भोर भए तुलसी चौरा पर, माई दीप जरावैं,
माटी के कलसवा में गंगाजल धरि, मनौती मनावैं।
“जितिया मैया! लाल हमारे, रहैं सदा सुखियार”,
सुनि पड़ोसिन बोल उठीं—“माई! पूरन होव तुम्हार।”
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
ननद पूछे—“भौजी कहवाँ, आजु काहे अन्न न खइहौ?”
माई हँसि कहि दे—“ललना खातिर, आजु नेम निभइहौ।”
सासु कहें—“बहुरिया! धीरज धरि, नेम निभइहौ अपार”,
माई बोले—“लाल सलामत, तौ का चाही संसार?”
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
आँगन बैठीं गाँव की मइयाँ, मंगल गीत सुनावैं,
ढोलक की थापों पर सब मिलि, जितिया जसु गुनगुनावैं।
“कइसन भाग तुम्हार बहिनी, लाल रहे सुखियार”,
माई कहे—“मैया की किरपा, बरसै सदा दुलार।”
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
साँझ ढले जब चंदा निकले, नीरव होय अँगनवा,
माई निहारे द्वार खड़ा होय, अपना नन्हक ललनवा।
“अम्मा! पहिले जल पी लऽ, काहे करत उपवास?”
माई हँसि बोली—“बेटवा, तोहरे खातिर नेम निबाहीं आज।”
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
भोर भए जब पारन होई, मंगल कलस सजाई,
ललना माथे हाथ धरि माई, मन ही मन मुस्काई।
“जितिया मैया! जन्म-जन्म तक, राखिहऽ अपनी छाँह”,
गाँव गूँज उठल सोहर से—“चिरंजीव हो ललनवा हमार!”
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर,
जितिया मैया सुनि ले अरजिया, पूरन करि मनुहार।
माई के नेम-ममता से महके, सारा कुल-परिवार,
जियें ललनवा लाख बरिस, महके अँचरा-दुआर।
- सनातन मुकुंद
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