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जलधार से ज्योत्स्ना तक : प्रकृति-चित्रणपरक गीतात्मक मुक्तक-चतुष्टय

                
                                                         
                            मेघ विदा, रोया आकाश,
                                                                 
                            
बूँदें छोड़ गईं मधुर सुवास।
धरा ओढ़े हरितिम चूनर,
पावस-स्मृति बनी मिठास॥

शरद हँसी, मुस्काया गगन,
चाँदनी से दमका चमन।
नील नभ दर्पण-सा दमके,
ज्योत्स्ना बरसाए सुधा-कण॥

निर्मल नभ में प्रभा समाई,
कमल-दलों पर ओस सुहाई।
पात-पात पर मोती दमकें,
मानो तारक-छवि उतर आई॥

पावस बीता, शरद मुस्काई,
नव आशा की अरुणिमा छाई।
ऋतु-चक्र का शाश्वत संदेश,
हर विदाई नव भोर जगाई॥
- सनातन मुकुंद
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4 घंटे पहले

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