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जहाँ ‘मैं’ नहीं रहा : उपनिषदीय–रहस्यवादी गीतिका

                
                                                         
                            कौन जला अंतःतम में, किसकी यह ज्योति अपार?
                                                                 
                            
कौन मौन वीणा में जागा, कैसी अनहद झंकार?

बूँद गिरी सिंधु में जाकर, कौन रहा फिर भिन्न?
लहर लहर को खोज रही है, कौन स्वयं अभिन्न?

दर्पण में जो रूप न दिखता, वही कहाँ साकार है?
नयन बंद होते ही भीतर, किसका निःशब्द संसार है?

श्वास चली तो कौन चला संग, श्वास रुकी तो कौन है?
देह-दीप बुझ जाने पर भी, कौन अनश्वर मौन है?

रजकण में किस नभ की गूँज है, कण में कौन विराट है?
एक बिंदु में कौन समाया, किसका मंगल प्रभात है?

छाया अपनी छवि से पूछे—कौन यहाँ उपस्थित है?
‘मैं’ मिटते ही मौन बताता—कौन स्वयं में स्थित है?

नाद जहाँ जाकर चुप हो जाए, वहाँ कौन-सी तान है?
शब्द जहाँ विलीन हो जाएँ, वहीं कौन-सा गान है?

आकाशों के पार न जाना, अंतस ही आकाश है,
जिसको बाहर खोज रहे थे, वही भीतर प्रकाश है।

अर्पित होकर जो रह जाता, वही अमृत-विश्वास है,
स्वयं विसर्जित होकर पाना—यही प्रेम की प्यास है।

कौन किसी को प्रेम करे अब, कौन किसी से दूर?
एक ज्योति में विलीन हुए, दीपक और कपूर।
-सनातन मुकुंद
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एक घंटा पहले

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