आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गुरु पूर्णिमा

                
                                                         
                            किसने शून्य-कमल पर धर दी, चन्द्र-राग की प्रथम किरण?
                                                                 
                            
किसका मौन अनिल बन छूता, जाग उठता अन्तर-अरण्य॥

नील निःश्वासों की वीणा पर, कौन अनाहत राग बहे?
दीप-शिखा की पलक-पलक में, किसकी अक्षय प्रभा झरे॥

धूलि नहीं—यह चरण-स्मृति है, पथ का कण-कण मन्त्रमय।
टूटा दर्पण हँसकर बोला—'मैं' मिटते ही सत्योदय॥

पूर्ण शशी तो नभ में दमके, अन्तःचिद्-ज्योति प्रखर जगे।
नाम न उसका, रूप न उसका—मौन गुरुतत्त्व सदा स्पुरे॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
23 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर