किसने शून्य-कमल पर धर दी, चन्द्र-राग की प्रथम किरण?
किसका मौन अनिल बन छूता, जाग उठता अन्तर-अरण्य॥
नील निःश्वासों की वीणा पर, कौन अनाहत राग बहे?
दीप-शिखा की पलक-पलक में, किसकी अक्षय प्रभा झरे॥
धूलि नहीं—यह चरण-स्मृति है, पथ का कण-कण मन्त्रमय।
टूटा दर्पण हँसकर बोला—'मैं' मिटते ही सत्योदय॥
पूर्ण शशी तो नभ में दमके, अन्तःचिद्-ज्योति प्रखर जगे।
नाम न उसका, रूप न उसका—मौन गुरुतत्त्व सदा स्पुरे॥
- सनातन मुकुंद
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