आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गुरु : ज्ञान-दीप की पावन बाती

                
                                                         
                            गुरु! ज्ञान-दीप की पावन बाती, चेतन-ज्योति अपार हो तुम,
                                                                 
                            
अज्ञान-तम के महा-निशीथ में, उषा का प्रथम प्रसार हो तुम।

करुणा की निर्मल मंदाकिनी, अमृतमयी रसधार हो तुम,
श्रद्धा के नित नूतन उपवन की, सुरभित दिव्य बहार हो तुम।

तुमसे जागे आत्म-प्रभाकर, तुमसे अंतःदीप प्रज्वलित,
तुमसे पावन हुई साधना, तुमसे जीवन हुआ प्रकाशित।

वेद-वाणी का सत्य सनातन, उपनिषदों का गूढ़ विचार,
तुमसे ही उद्घाटित होता, आत्मतत्त्व का दिव्य द्वार।

अहंकार-हिम पल में गलता, विनय-वसंत प्रसून खिलें,
चरण-रज की पावन रेखा से, जीवन-पथ के तम सब मिटें।

तुम दीपक, हम बाती बनकर, जलें लोक-मंगल के हेतु,
स्वार्थ-सीमाएँ लाँघ प्रेम से, जोड़ें मानवता का सेतु।

जहाँ तुम्हारी कृपा बरसती, वहाँ विवेक-प्रभात उतरता,
मौन स्वयं संगीत बन जाता, कण-कण ब्रह्म-प्रकाश निखरता।

शत-शत वंदन, श्रद्धा-सरिता, चरण-कमलों में समाती।
युग-युग तक आलोकित रखना, गुरु! ज्ञान-दीप की पावन बाती॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
14 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर