गुरु! ज्ञान-दीप की पावन बाती, चेतन-ज्योति अपार हो तुम,
अज्ञान-तम के महा-निशीथ में, उषा का प्रथम प्रसार हो तुम।
करुणा की निर्मल मंदाकिनी, अमृतमयी रसधार हो तुम,
श्रद्धा के नित नूतन उपवन की, सुरभित दिव्य बहार हो तुम।
तुमसे जागे आत्म-प्रभाकर, तुमसे अंतःदीप प्रज्वलित,
तुमसे पावन हुई साधना, तुमसे जीवन हुआ प्रकाशित।
वेद-वाणी का सत्य सनातन, उपनिषदों का गूढ़ विचार,
तुमसे ही उद्घाटित होता, आत्मतत्त्व का दिव्य द्वार।
अहंकार-हिम पल में गलता, विनय-वसंत प्रसून खिलें,
चरण-रज की पावन रेखा से, जीवन-पथ के तम सब मिटें।
तुम दीपक, हम बाती बनकर, जलें लोक-मंगल के हेतु,
स्वार्थ-सीमाएँ लाँघ प्रेम से, जोड़ें मानवता का सेतु।
जहाँ तुम्हारी कृपा बरसती, वहाँ विवेक-प्रभात उतरता,
मौन स्वयं संगीत बन जाता, कण-कण ब्रह्म-प्रकाश निखरता।
शत-शत वंदन, श्रद्धा-सरिता, चरण-कमलों में समाती।
युग-युग तक आलोकित रखना, गुरु! ज्ञान-दीप की पावन बाती॥
- सनातन मुकुंद
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