दर्पण चुप, छवि चुप, फिर भी कोई मुस्काता है,
नयन मूँदते ही भीतर, कौन दीप जलाता है?
छाया अपनी छाया से, किसका भेद छिपाती है,
बूँद सागर में गिरकर, किसकी प्यास बुझाती है?
नीर न जाने चाँद को, चाँद नीर में उतरता है,
रात स्वयं में डूबकर, तारों से क्या कहती है?
पत्ता झरे डाल से, फिर भी वृक्ष कहाँ झरता है,
मिट्टी का कण मौन रहे, पर्वत बनकर उठता है।
शून्य गगन की गोद में, कौन अनहद गाता है,
मौन खड़ी उस बाँसुरी में, कौन स्वर जगाता है?
दीप स्वयं को भूलकर, किस तम को हर जाता है,
छवि स्वयं को खोजती, किस चेहरे में खो जाती है?
ओस-कण में कौन छिपा, सूरज बन मुस्काता है,
साँसों के दो तटों बीच, कौन श्वास बन जाता है?
‘मैं’ की टूटी नाव को, कौन पार ले जाता है,
दर्पण जब चूर हो जाए—कौन स्वयं को पाता है?
-सनातन मुकुंद
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