मौन दर्पण पूछ रहा है—कौन खड़ा इस पार?
रूप निहारूँ, रूप निहारूँ—फिर भी कौन साकार?
नयन मिले तो नयन मिले हैं, दृष्टि मगर अनजान,
छवि मेरी है, छवि में जाने किसका है अभिमान?
अधर हँसे, फिर हँसी खिली है, अंतस फिर भी मौन,
बाहर मेरा रूप सँवारा, भीतर बैठा कौन?
ऋतु बदली, तन-रंग बदला, बदले रूप हजार,
दर्पण वैसा ही क्यों ठहरा—कौन रहा साकार?
धूल जमी तो छवि धुँधली थी, दर्पण धुँधला नहीं,
मन पर मल की परत चढ़ी तो सत्य दिखा क्यों नहीं?
एक दीप जब सम्मुख जलता, दीप जले सौ बार,
ज्योति एक ही ज्योति रही फिर, रूप हुए विस्तार।
दर्पण टूटा, खंड हुए तो, खंडित हुए स्वरूप,
एक अखंड मुख खोज रहा है अपना ही स्वरूप।
जल की काँपती सतहों पर, चंद्र खिला मुस्काया,
लहर थमी तो चंद्र वही था—कौन बदला, कौन रहा?
दर्पण के उस पार खड़ा जो, आँख उसे न पहचान,
जिसको खोज रही थी दृष्टि, दृष्टि बनी अनजान।
नयन मूँदकर भीतर देखा—दर्पण गया विलीन,
‘मैं’ को खोजा, ‘मैं’ ही गलता—शेष रहा बस मौन।
प्रश्न स्वयं जब मौन हुआ तो, मौन हुआ संसार,
दर्पण अब भी पूछ रहा है—कौन खड़ा इस पार?
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X