दामिनी दिगंत-द्वार पर, स्वर्ण-शंख-सी बज जाती,
तम के तिमिर-वितानों में, ज्योति-जया बन छा जाती।
मेघ-मुकुट के मध्य सहसा, हँसती चपला-रानी है,
मानो नभ की वीणा पर, जागी नव कल्याणी है।
पलभर का वह दिव्य विलास, युग का मंत्र सुनाता है,
क्षणभंगुरता के अंतर में, नित्य सत्य झलकाता है।
चूम शिखर गिरिराजों के, तेज-तिलक धर जाती है,
वन-उपवन की मौन शिरा में, चेतन-सुधा भर जाती है।
विद्युत्-वधू की चंचल चितवन, जलधर-मन हर लेती है,
धरती की सुप्त प्रार्थनाओं को, अमृत-स्वर दे देती है।
वह केवल आकाश-रेखा की, उज्ज्वल लिपि नहीं होती,
ब्रह्म-वितान के गूढ़ रहस्य की, प्रथम ऋचा-सी होती।
दामिनी जब मुस्काती है, प्रकृति पुराण खुल जाता,
अंतरतम का सुप्त सूर्य भी, सहसा स्वयं निकल आता।
क्षण में प्रकट, क्षण में तिरोहित—यह कैसा अनुपम दान!
दामिनी सिखला जाती है—ज्योति ही जीवन का विधान।
- सनातन मुकुंद
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