चाँद ने खोले निशा में रजत-किवाड़ आज,
चाँदनी ने छेड़ दी मन की सितार आज।
मौन की गहराइयों में कौन मुस्काया—
आत्मा ने सुन लिया अनहद-निनाद आज।
चाँद जैसे ध्यान का निष्कम्प दर्पण हो,
चाँदनी जैसे करुणा का मधुर स्पन्दन हो।
जो न उतरा शब्द बनकर आज तक जग में—
वह हृदय में गूँजता कोई निमन्त्रण हो।
चाँद ने अम्बर-पटों पर श्वेत-मन्त्र लिखे,
चाँदनी ने प्राण में जागे विवेक लिखे।
रात की निस्तब्धता ने यह रहस्य कहा—
शून्य ने ही सृष्टि के आद्य अभिलेख लिखे।
चाँद यदि ब्रह्माण्ड का जाग्रत विचार है,
चाँदनी उस चेतना का मौन विस्तार है।
जो दिखाई दे रहा वह मात्र प्रतिबिम्ब है—
सत्य तो अन्तःस्थित निस्तब्ध सार है।
- सनातन मुकुंद
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