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बीते पलों की वापसी : प्रतीकात्मक आध्यात्मिक दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            किस नभ-वीणा के तारों से, फिर मधुर राग झरने लगे?
                                                                 
                            
बीते पलों के मौन पंख फिर, अंतर्मन में भरने लगे॥

काल-सिंधु की गहरी धारा, बहा ले गई पदचिह्न सभी।
फिर भी स्मृति के श्वेत कमल पर, अंकित हैं वे चित्र अभी॥

बचपन की वह धूप सुनहरी, आँगन में फिर मुस्काती है।
माँ के आँचल की शीतल छाया, मन-वीणा को सहलाती है॥

मित्र-स्नेह की निर्मल सरिता, फिर चेतन में बह जाती है।
भूली-बिसरी मधुर कथाएँ, जीवन-दीप जला जाती हैं॥

रेत-घड़ी की सूनी मुट्ठी, समय कभी लौटाती नहीं।
पर अनुभूति की पावन गंगा, कोई स्मृति मिटाती नहीं॥

जो पल प्रेम-सुगंधित थे, वे आत्मा में बस जाते हैं।
मौन प्रार्थना बनकर भीतर, युग-युग तक मुस्काते हैं॥

बीते क्षण केवल घटनाएँ, नहीं समय के टूटे फूल।
वे तो जीवन-वृक्ष बने हैं, जिनसे महक रहे हैं मूल॥

जब अंतर्मन निर्मल होता, जब अहंकार का तम ढलता।
तब हर बीता हुआ पल आकर, चेतन-दीप स्वयं बन जलता॥

वापस आते नहीं दिवस वे, फिर भी सत्य यही कह जाता—
जो प्रेम, करुणा, सत्य जिया हो, वह कभी नहीं खो जाता॥

बीते पलों की वह वापसी, स्मृति मात्र का स्वर नहीं है।
यह तो आत्मा के आकाशों में, अनंत प्रकाश का उदय यहीं है॥
- सनातन मुकुंद
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एक महीने पहले

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