बदरिया घिर गए गगन, नव नीलम-वसन लहराए,
दामिनि की दीपशिखा में, ब्रह्म-निनाद स्वयं मुस्काए।
मन के सूने देवालय में मेघ-मृदंग स्वयं बज उठे,
प्यासी धरती ने अंबर के मौन प्रणय-राग गुनगुनाए॥
बूँद-बूँद में अनहद वीणा के गुप्त स्वर झर आए,
स्मृतियों के शतदल पर फिर चिर-सुगंधित क्षण इतराए।
अंतर के निर्वातों में चिर सुप्त प्राण स्वयं जग उठे,
जीव-ब्रह्म के मधुर मिलन का अगम रहस्य झलकाए॥
- सनातन मुकुंद
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