नील नभ ने खोल दिया, बादल का अभिसार,
बूँद-बूँद में लिख भेजा है, धरती को मनुहार।
शुष्क अधर की प्यास पढ़ो, मौन मेघ के मीत,
किस विरही के उर में जागे, पावस का संगीत?
गिरि-उर पर झुक मेघ ने, श्यामल कर-पसार,
वन-पल्लव के कानों में, गूँजे राग मल्हार।
बूँद-बूँद से भाग्य सँवरे, मरु को मिले वरदान,
कण-कण में सोया है, सागर का प्रतिमान।
बिजुरी ने क्षण भर में खोला, अंतर-अभिलेख,
गर्जन में भी छिपा हुआ है, करुणा का संदेश।
जो धरती से दूर रहे, वे क्या जानें नेह,
झुककर बरसे मेघ तो, हरियाए मरुगेह।
बरस-बरसकर रिक्त हुआ जो, बना घनश्याम,
त्याग-दीप से दीप्त हुआ, उसका पुण्य ललाम।
बूँद स्वयं को खोकर पाती, सागर का विस्तार,
मिटने में ही मिल जाता है, अस्तित्व का सार।
पाती पढ़कर नभ मुसकाया, धरती हुई निहाल,
अंतरिक्ष के मौन-कक्ष में, गूँजा अनहद-ताल।
मेघ कहे—“मत बाँध मुझे, रूप-रंग के छोर,
मैं अदृश्य प्रेम से जोड़ूँ, मन से मन की डोर।”
जब मन का मरु तपे, खोलो उर के द्वार,
अंतर-आकाश से उतरे, करुणा की जलधार।
बादल की पाती में छिपा, आत्मतत्त्व का ज्ञान—
जो बरसाता प्रेम जगत पर, वही स्वयं भगवान्।
-सनातन मुकुंद
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