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बदलते मौसम : प्रतीकात्मक आध्यात्मिक गीतिका

                
                                                         
                            किस ऋतु-वीणा के तारों पर, काल-राग यह बजता है?
                                                                 
                            
किस अनदेखे चित्रकार से, जीवन-वन फिर सजता है?॥

पतझर बन जब मोह झरें, तब अंतर-आँगन स्वच्छ बने।
वसंत बने जब सत्य-कुसुम, चितवन में नव अर्थ खिले॥

सावन बन कर करुणा बरसे, भीगे अन्तः-निर्झर।
ग्रीष्म बने तप-आराधना, जले अहं का तम-आवरण॥

शिशिर उतर मौन-धवलता, चेतन-शिखरों पर छाए।
हेमन्त की गंभीर निःश्वासें, आत्म-ज्योति जगमगाएँ॥

बदल रहे मौसम बाहर भी, भीतर भी परिवर्तन है।
जो स्थिर दिखता जग में सारा, क्षणभंगुर स्पन्दन है॥

काल न केवल पर्ण झराता, साक्षी का नित बोध जगे।
ऋतु का प्रत्येक आवर्तन, ऋत का नव आलोक जगे॥

जो हर ऋतु में स्वयं जगा, वही अनन्त बसन्त मिला।
जिसने परिवर्तन अपनाया, उसे आत्मबोध मिला॥

मौसम आते-जाते रहते, साक्षी नित्य अचल रहता।
ऋतु के पार जहाँ मौन खिले, आत्म-प्रकाश स्वयं प्रकटे॥
- सनातन मुकुंद
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एक महीने पहले

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