नव-भास्वर की रश्मि-प्रभा, गगन-मण्डप में गाती है,
तम-अंधकार के उर को भेद, स्वर्ण-धूलि बरसाती है।
परमात्मा की मूक कला, क्षितिज-किनारे पलती है,
अम्बर के निर्जन आँगन में, सहसा ज्योति मचलती है।
अनादि काल की मन्त्र-मयी, यह लालिमा अलौकिक है,
सृष्टि-चक्र की आदि-मुद्रा, दिव्य और मौलिक है।
लोहित नभ का स्वप्न-पुंज, आलोक-राग बन छाया है,
नूतन दिवस के स्वागत में, अरुणिमा ने मनुज जगाया है।
-सनातन मुकुंद
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