दूध का जला छाछ भी, फूँक-फूँक कर पीता है।
अनुभवाग्नि में तपकर, चेतन सत्य को जीता है॥
पीड़ा केवल दाह नहीं, प्रज्ञा का प्रथम उद्गम है।
हर आघात स्वान्त में, सत्य-बोध का संगम है।
जो दुःख को गुरु माने, मोह-बंधन हर लेता है।
अनुभवाग्नि में तपकर, चेतन सत्य को जीता है॥
विश्वासों का टूटना अक्सर, अहं का क्षालन है।
हर आशाभंग के गर्भ में, नवजीवन का स्पंदन है।
प्रज्ञा-दीप से प्रदीप्त मन, भ्रम-तम हर लेता है।
अनुभवाग्नि में तपकर, चेतन सत्य को जीता है॥
सावधानी भय नहीं, आत्मप्रज्ञा का अनुशासन है।
संयम आत्मपथिक का, मौन अमर पाथेय-धन है।
जो निज अंतर पढ़ना सीखे, जग-मर्म समझता है।
अनुभवाग्नि में तपकर, चेतन सत्य को जीता है॥
जीवन केवल युद्ध नहीं, चेतन का परिष्कार है।
हर क्षति के गर्भ में, नव-सृजन का विस्तार है।
ऋत के शाश्वत नियमों में जो, स्वयं ढल जाता है।
अनुभवामृत से सिंचित मन, अंतःदीप जागता है॥
दूध का जला छाछ भी, फूँक-फूँक कर पीता है।
अनुभव से जो ज्ञान जगे, मुक्तिपथ वह जीता है।
बाह्य जग से बढ़कर भीतर, अंतःदीप प्रदीप्त हो।
विवेक-सुधा का पान वही, मुक्तिपथ को जीता है॥
- सनातन मुकुंद
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