मन ने धुंध के दर्पण में, जाने कितने रूप गढ़े,
छाया को ही सत्य मानकर, अपने ही संबंध पढ़े।
एक चिंगारी अहंकार की, वन-वन भीतर फैल गई,
शब्द रहे बस चार अधूरे, अर्थ मगर शतखंड हुए।
रेत-लिखी सी बातों ने, पत्थर जैसे घाव दिए,
क्षण की ज्वाला ने वर्षों के, मधुर दीप सब बुझा दिए।
नयन बंद थे बाहर की ओर, दोष दिशाओं में खोजे,
भीतर बैठे मौन विवेक ने, कितने उत्तर रोक लिए।
नदी किनारे प्यासा मन, मरुस्थल ढूँढ़ता रहा,
मुट्ठी में ही जल था, फिर भी बाहर दौड़ता रहा।
दर्पण पर जो धूल जमी थी, चेहरे को दोषी ठहराया,
स्वच्छ हुआ जब अंतस, अपना ही चेहरा बोल उठा।
टूटी वीणा पूछ रही थी—तार कहाँ से टूटे हैं?
घावों के पीछे अक्सर कुछ, अनकहे स्वर छूटे हैं।
जिसे समझकर शूल कहा था, वह भी कोई फूल रहा,
स्पर्श बदलते ही अर्थों के, बंद कपाट सब खुलते हैं।
अहंकार की ऊँची मीनार, एक हवा में ढह जाती,
नम्रता की छोटी कुटिया, आँधी में भी रह जाती।
जो हर निर्णय से पहले अपने, अंतर्मन को पढ़ लेता,
उसके शब्द नहीं, मौन भी, रिश्तों में सेतु बनाता।
दोष पराए खोजते-खोजते, जीवन संध्या हो जाती,
एक क्षण की आत्मदृष्टि ही, जन्म-जन्म की गाँठें खोलती।
जो स्वयं को जीत गया, वह जग से क्या फिर युद्ध करे—
जिसने अंतर्दर्पण धोया, उसने हर संबंध समझा।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X