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अंतरज्योति : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            नील गगन की देहरी पर, किसने धूप सजाई है?
                                                                 
                            
मौन शिखर की शिला चीर, किसने प्यास बुझाई है?

सूखे पत्तों की सरसर में, किसने ऋतु सुनवाई है?
जिसने भीतर दीप न देखा, उसने भोर कहाँ पाई है?

काँच-महल के स्वप्न सजाकर, कौन अमर हो पाएगा?
रेत-महल की नींव पकड़कर, कौन सागर ठुकराएगा?

जिसके अंतर राख बची हो, वह अंगार कहाँ पाएगा?
अपने भीतर ज्योति न जागे, जग का तम क्या जाएगा?

बादल अपने रंग बदलते, नभ का सत्य न बदलेगा,
ऋतु चाहे सौ बार पलटे, बीज समय पर फूटेगा।

जिस दिन मन का द्वार खुलेगा, मौन स्वयं कुछ बोलेगा,
बाहर खोजा दीप अगर तो, भीतर कौन उजियारेगा?

चल, अपनी ही श्वासों में अब, अनहद राग जगाएँ हम,
टूटे हुए सितारों से भी, नूतन नभ बनवाएँ हम।

जिस तम ने पथ रोक लिया है, उसका नाम मिटाएँ हम—
दीपक बनकर स्वयं जलें तो, युग का भाग्य जगाएँ हम।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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